ग्रेटर नोएडा इन दिनों दो बड़ी घटनाओं से सुर्खियों में है—पहली, निकी की दहेज हत्या, और दूसरी, उसके पति विपिन भाटी का एनकाउंटर, जिसमें पुलिस ने उसके पैर पर गोली मारी। ये दोनों घटनाएँ न सिर्फ एक परिवार की त्रासदी हैं बल्कि भारतीय समाज में गहराई तक जमी दहेज प्रथा और अपराध पर पुलिस की सख्त कार्रवाई का प्रतीक भी हैं।
निकी की कहानी: दहेज प्रथा की आग में झुलसी जिंदगी
साल 2016 में निकी की शादी विपिन भाटी से हुई थी। शुरुआत में शादी के वक्त दिए गए “तोहफे” ही काफी समझे गए। लेकिन वक्त के साथ माँगे बढ़ती गईं—नकद, गाड़ी और आखिर में ₹36 लाख की भारी माँग। जब परिवार ये रकम देने में असमर्थ रहा, तो निकी पर अत्याचार बढ़ गए।
21 अगस्त 2025 को निकी को उसके ससुराल वालों ने कथित रूप से पीटा, केरोसिन डालकर आग के हवाले कर दिया—वो भी उसके छोटे बच्चे के सामने।
यह केवल एक हत्या नहीं थी, बल्कि समाज के सामने आई एक भयानक सच्चाई थी—दहेज प्रथा आज भी निर्दोष औरतों की जान ले रही है।
एनकाउंटर: कानून का त्वरित जवाब
निकी की मौत के कुछ ही दिनों बाद पुलिस ने विपिन भाटी को गिरफ्तार किया। लेकिन पुलिस के अनुसार, वह हिरासत से भागने की कोशिश करने लगा। जवाबी कार्रवाई में पुलिस ने उसके पैर पर गोली चलाई—यानी “pair pe mari goli।”
बहुतों के लिए यह एनकाउंटर सिर्फ एक पुलिस कार्रवाई नहीं, बल्कि एक सख्त संदेश है कि दहेज हत्या जैसे अपराधों को किसी भी हाल में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। हालांकि कुछ लोग एनकाउंटर को लेकर सवाल भी उठाते हैं, लेकिन जनता का एक बड़ा वर्ग इसे त्वरित न्याय मान रहा है।
दहेज हत्या: एक राष्ट्रीय समस्या
निकी की मौत दुखद है, लेकिन यह कोई अकेली घटना नहीं। हर साल भारत में हजारों दहेज हत्या के मामले दर्ज होते हैं। कई बार इन्हें “दुर्घटना” या “आत्महत्या” का नाम देकर छुपा दिया जाता है।
ग्रेटर नोएडा एनकाउंटर में घायल विपिन की तस्वीर एक प्रतीक है—जहाँ कभी कानून पीड़िता की रक्षा करने में कमजोर दिखता था, वहीं अब अपराधी को गोली से जवाब दे रहा है।
समाज की जिम्मेदारी
यह सच मान लेना चाहिए कि दहेज हिंसा केवल पुलिस और अदालत से शुरू नहीं होती। यह हमारे घरों, रिवाजों और रिश्तों में पलती है। जब परिवार “शादी में गिफ्ट” को सामान्य मान लेता है, जब रिश्तेदार बहू को “समझौता” करने की सलाह देते हैं, तभी यह प्रथा मजबूत होती है।
निकी की मौत हमें यही सोचने पर मजबूर करती है कि अगर समाज ने उसके साथ पहले खड़ा होता, तो शायद यह दिन कभी नहीं आता।
एनकाउंटर बनाम असली न्याय
विपिन भाटी के पैर में गोली लगना खबर बन गई, लेकिन बड़ा सवाल यह है—क्या केवल एनकाउंटर से दहेज प्रथा खत्म होगी? असली न्याय तभी मिलेगा जब कानून मजबूत हो, मुकदमे तेजी से चलें और औरतें बिना डर अपनी बात रख सकें।
सिर्फ अपराधी को सज़ा देना काफी नहीं है, समाज को भी अपनी सोच बदलनी होगी।
आग और गोली का प्रतीक
निकी की जलती हुई चीखें मदद की पुकार थीं। और विपिन के पैर में लगी गोली एक चेतावनी है—उन सबके लिए जो अब भी दहेज की माँग करते हैं।
ये दोनों घटनाएँ मिलकर हमें याद दिलाती हैं कि अगर समाज ने समय रहते दहेज प्रथा को खत्म नहीं किया, तो और भी निकी जैसी बेटियाँ बलि चढ़ती रहेंगी।
निष्कर्ष
निकी की मौत हमें झकझोर देती है, और विपिन भाटी का एनकाउंटर हमें सोचने पर मजबूर करता है। एक बात साफ है—दहेज प्रथा मारती है, और इसे खत्म करना समाज की जिम्मेदारी है।
अगर हम सचमुच बदलाव चाहते हैं, तो हमें यह ठानना होगा कि न दहेज देंगे, न लेंगे। तभी असली न्याय मिलेगा—न कि सिर्फ गोलियों से, बल्कि सोच और संस्कृति के बदलाव से।